Mann

अजीब सा अँधेरा था
कुछ दिखाई नहीं दे रहा था
अँधेरा बढ़ता जा रहा था

 

बस कहीं से कुछ आवाज़ सुनाई दे रहा था
मन तो नहीं था, आवाज़ का पीछा करून
पर पता नहीं, अँधेरा बढ़ता गया…

 

सोचा इंतज़ार करते हैं
शायद पूर्णिमा की रात हो
कुछ रौशनी मैं उम्मीद बने
शायद आगे बढ़ने की

 

पर आवाज़ रौशनी को काट रही थी
देखने से पहले मिटा दे रही थी

 

सुबह का बस इंतज़ार था
शायद अँधेरा ख़तम हो जाये

 

सूरज की पहली किरण पड़ी चेहरे पे
अँधेरा ख़तम हो रहा था

 

पर अब भी अँधेरा था
अभी भी कुछ नहीं दिख रहा था

 

शायद सूरज भी कुछ कर नहीं सकता
बादल घने होते जा रहे थे

 

और घना होता जा रहा था
बारिश होती जा रही थी

 

लोग परेशान हो रहे थे
पर बारिश बंद नहीं हो रही थी

 

छुपने की जगह खोज रहा था
गिला कर रही थी मुझे यह बारिश….

 

सोचा की अच्छा होगा की
वहां से निकल जाओं

 

पर बादल पीछा नहीं छोड़ नहीं रही थी
कुछ तो आवाज़ अभी भी सुनाई दे रहा था
फिर से हिम्मत की
पीछा करून आवाज़ का

 

हलकी सी रौशनी जब
चेहरे पे पड़ी….
लगा की बादल छंट रहा है

 

कुछ साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था
सूरज अब दिखाई दे रहा था
बारिश भी बंद हो रही थी

 

पर अब भी कुछ बादल है
वो अब भी रौशनी को रोक रहे है
बादल के पीछे अभी भी कुछ आवाज़ छुप्पी है
पर पता नहीं, कब बरश जाये

 

शायद यह अँधेरा अगली सुबह ही ख़तम हो जाये
शायद बादल के पीछे आवाज़, ख़ुशी मैं बदल जाये
शायद बारिश हो  तो, लोग के चेहरे पे ख़ुशी झलके

 

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