Chotti si Gudia

एक छोट्टी सी गुडिया,

थोरी सी मोटी,

थोरी सी नटखट

थोरी सी गोल

पर बहुत अनमोल

 

 

“सुनो ना” से शुरु जो होती थी,

कभी बंद ना होती थी

 

 

कभी  चिल्लाना,

कभी  समझाना,

कभी  ब्रूम ब्रूम,

कभी  रुलाना,

कभी  हसाना

 

 

 

फिर एक दिन,

गुडिया  दूर चली गयी…

 

 

 

अजीब सी ख़ामोशी थी,

जैसे खुशियाँ यादें बन गयी है,

यादें पल बन गया है,

पल  क्षण बन गया  है,

क्षण  समय  बन  गया है,

समय तो रुक ही गया था…

 

 

सबेरा  हुआ,

समय  चल रहा था…

गुडिया बहुत खुश थी,

जिंदगी मुस्कुरा रही है फिर से

अब नहीं  लगता  दूर  है

अब  तो  बहुत  पास  है

मेरी छोट्टी  सी गुडिया


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Socha Na Tha

Socha tha…

Bada hoke… Naam roshan karunga…

Phir socha… Kuch aur karte hain…

Kuch karne ki soch raha tha…

Result nikal gaya…

Aur.. Sare planning change…

Phir socha… Engineer banate hain…

Char shaal…. Bahut P(L)adhai ki…

Kuch sapne bun raha tha….

Phir…

Result nikal gaya…

Samajh main aa gaya….

Naam roshan kya karoge…

Pass list main naam aa jaye..

Yehi kafi hai aur jindagi bhi…

Phir socha….

Ab kya karenge….

Jab tak socha…. Logon ne laat mari…

Jis din sochana band kiya….

Us din se…

Welcome abroad…

Pehli salary… Pehla appraisal…

Pehli nike shoe, Pehla lee jeans…

Sab yaad hai…

Bas kahin kisi nukkar pe…

Jindagi bhul ke aa gaye…

Socha Na Tha

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Mann

अजीब सा अँधेरा था
कुछ दिखाई नहीं दे रहा था
अँधेरा बढ़ता जा रहा था

 

बस कहीं से कुछ आवाज़ सुनाई दे रहा था
मन तो नहीं था, आवाज़ का पीछा करून
पर पता नहीं, अँधेरा बढ़ता गया…

 

सोचा इंतज़ार करते हैं
शायद पूर्णिमा की रात हो
कुछ रौशनी मैं उम्मीद बने
शायद आगे बढ़ने की

 

पर आवाज़ रौशनी को काट रही थी
देखने से पहले मिटा दे रही थी

 

सुबह का बस इंतज़ार था
शायद अँधेरा ख़तम हो जाये

 

सूरज की पहली किरण पड़ी चेहरे पे
अँधेरा ख़तम हो रहा था

 

पर अब भी अँधेरा था
अभी भी कुछ नहीं दिख रहा था

 

शायद सूरज भी कुछ कर नहीं सकता
बादल घने होते जा रहे थे

 

और घना होता जा रहा था
बारिश होती जा रही थी

 

लोग परेशान हो रहे थे
पर बारिश बंद नहीं हो रही थी

 

छुपने की जगह खोज रहा था
गिला कर रही थी मुझे यह बारिश….

 

सोचा की अच्छा होगा की
वहां से निकल जाओं

 

पर बादल पीछा नहीं छोड़ नहीं रही थी
कुछ तो आवाज़ अभी भी सुनाई दे रहा था
फिर से हिम्मत की
पीछा करून आवाज़ का

 

हलकी सी रौशनी जब
चेहरे पे पड़ी….
लगा की बादल छंट रहा है

 

कुछ साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था
सूरज अब दिखाई दे रहा था
बारिश भी बंद हो रही थी

 

पर अब भी कुछ बादल है
वो अब भी रौशनी को रोक रहे है
बादल के पीछे अभी भी कुछ आवाज़ छुप्पी है
पर पता नहीं, कब बरश जाये

 

शायद यह अँधेरा अगली सुबह ही ख़तम हो जाये
शायद बादल के पीछे आवाज़, ख़ुशी मैं बदल जाये
शायद बारिश हो  तो, लोग के चेहरे पे ख़ुशी झलके

 

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